Monday, May 20, 2019

वह आदमी जान ही नहीं पाया

 वह आदमी जान ही नहीं पाया

– सुभाष मुखोपाध्याय
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ट्रांसलेशन(बांग्ला से हिंदी) : नयना
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बांयें तरफ की जेब संभालते -संभालते
उस आदमी ने अपना लोक-परलोक सब गवाया !
हाय! हाय!


जबकि
थोड़ा-सा और नीचे टटोलता तो
उसे मिल जाता आलादीन का वो जादुई चिराग।
उसका दिल!
पर वह आदमी कभी ये जान ही नहीं पाया!

उसके पैसे के पेड़ पर ढेरों पत्ते उगे
लक्ष्मी ऐसे आई, मानो दौड़ती हुई
लम्बे लम्बे बांस के पैरों पर चढ़कर!
दीवार सतर्क खड़ा रहा पहरे में
कोई कमीना, दिल-फरेब हवा
कहीं से भी न घुस पाए!

फिर एक दिन
दोनों हाथों से
भुक्कड़ों की तरह सब निगलते-निगलते
दो उँगलियों के बीच से
जाने कब फिसल गई उसकी ज़िन्दगी!

वह आदमी जान भी न पाया!


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লোকটা জানলই না – সুভাষ মুখোপাধ্যায় বাঁ দিকের বুক পকেটটা সামলাতে সামলাতে হায়! হায় ! লোকটার ইহকাল পরকাল গেল ! অথচ আর একটু নীচে হাত দিলেই সে পেতো আলাদ্বীনের আশ্চর্য প্রদীপ, তার হৃদয় ! লোকটা জানলোই না ! তার কড়ি গাছে কড়ি হল । লক্ষ্মী এল রণ-পায়ে দেয়াল দিল পাহাড়া ছোটলোক হাওয়া যেন ঢুকতে না পারে ! তারপর একদিন গোগ্রাসে গিলতে গিলতে দু’আঙ্গুলের ফাঁক দিয়ে- কখন খসে পড়েছে তার জীবন- লোকটা জানলই না !

Wednesday, February 27, 2019

I understand!


I understand your pain at my suggestion that there should be no borders.
You lose that one identity you have always felt one with.
You hence choose to confer me with some other.
"Idle idealist!",  you call me.  Or "idiot-intellectual" at times.
Calling me names feels better than calling yourself a homeless man.
You have accepted a name for your home, after all.
Though the name never had anything to do with you
You never had a role anyway..

I understand why you call me a "commie" with a lot of indignation!
After all I dare to suggest a class-less society!
Who would you pity if there are no beggars?
If the person coming to mow your lawn is also the pilot who flies you to the next city,  
If it's his side business to build college fund for his boys but he also can talk about his last visit to Paris with you, 
Who do you boss around? 
The class is such a part of your identity!
It almost feels like your right to be at the top end of the slope . 
You feel upper and claim middle. 
You definitely do not want to lose the power that comes with that identity! 
And that feeling of being a self-made man! Aah! Heaven!


I understand your pain at my suggestion of a caste-less society.
I almost try to rob you off the identity that you have lived with.
It's like going through Linda Goodman knowing you are a Libran,
And finding everything right there!
And then, after many years, getting to know that you were actually a Taurean!
You definitely do not want to know you are not a Brahmin.
You never were.


And then a Rohith dies trying to lose his caste tag!
And it's only after he is long dead,
A court of law takes away his reason to die for. 

His caste. 







Tuesday, December 25, 2018

अमलकांति

अमलकांति मेरा दोस्त है 
 हम स्कूल में एक साथ पढ़ते थे। 
 रोज़ देर से आता था, और सबक कभी न याद रहता था उसे। 
 शब्द-रूप पूछो तो ऐसे हैरानी से खिड़की की ओर देखता था 
 दिल में टीस-सी होती थी हमें |
 
 हम में से कोई मास्टर बनना चाहता था, कोई डॉक्टर, कोई वकील 
 अमलकांति इन में से कुछ भी नहीं बनना चाहता था। 

 वो धूप बनना चाहता था। 
 वो शर्मीली-सी धूप, जो बारिश रुकने के बाद शाम को निकलती है 
 वही जो जामुन के पत्ते पे ज़रा सी हँसी की तरह फैल जाया करती है ...


 हम में से कोई मास्टर बना, कोई डॉक्टर, कोई वकील 
 अमलकांति धूप न बन सका। 
 वह अभी एक अँधेरी प्रेस में काम करता है 
 और कभी-कभी मुझसे मिलने आता है। 
 चाय पीता है, इधर-उधर की बातें करता है 
 और बोलता है, "चलता हूँ फिर!" 
 मैं उसे दरवाज़े तक छोड के आता हूँ।
 
 हम लोगो में से जो मास्टर बना,
 वह आराम से डॉक्टर बन सकता था 
 जो डॉक्टर बनना चाहता था 
 वह अगर वकील बनता तो कोई नुकसान न था।
 
 पर सबकी इच्छाएं पूरी हुई, सिवाय अमलकांति केे। 
 वही अमलकांति, जो धूप के बारे में

 सोचते सोचते ...
 सोचते सोचते ..
 एक दिन खुद धूप बन जाना चाहता था।
 










~ Nirendranath Chakrabarty 
(ये बंगाली भाषा के कवि हैं, जिनका निधन साल 2018, दिसंबर में हुआ) 

Translation : Nayana/नयना 

Wednesday, December 12, 2018

"मुझसे इश्क़ करने के बाद"

"मुझसे इश्क़ करने के बाद"

(बांग्लादेशी कवि : हुमायूँ आज़ाद)
(हिंदी ट्रांसलेशन : नयना)
 ________

 मुझसे इश्क़ करने के बाद तुम्हारा कुछ भी पहले जैसा नहीं रह पायेगा। 
 जैसे हिरोशिमा के बाद 
 उत्तरी से दक्षिणी मेरु तक कुछ भी पहले जैसा नहीं रहा।
 
 दरवाजे पर जो घंटी बजी ही नहीं, उसीको सुनोगी बार बार 
 सब दरवाजे खिड़कियाँ काँप उठेंगे और तुम्हारा दिल भी 
 जैसे बिजली गिरी हो! 
 अगले ही पल तुम्हारा छन छन बोलता, इधर उधर दौड़ता खून, 
 ठंडा पढ़ जाएगा| 
 जैसे सन इकहत्तर में दरवाजे पर बूट की अजीब आवाज़ से 
 ढाका की आवाम सुन्न हो जाया करती थी।
 
 मुझसे इश्क़ करने के बाद कुछ भी पहले जैसा नहीं रह जायेगा 
 रास्ते में उतरते ही देखोगी जैसे सामने से आनेवाली हर एक रिक्शा में
मै ही चला आ रहा हूँ भागता हुआ
और बिना रुके, तुमसे दूर जा रहा हूँ । 
 इधर उधर ।
बस यूँ ही! कहीं भी!

तब तुम्हारे खून और काले चश्में में इतना गहरा अँधेरा छायेगा.. 
 जैसे उन आँखो से तुमने कभी भी, कुछ भी न देखा हो।
 
मुझसे प्यार करने के बाद तुम भूल जाओगी वास्तव -अवास्तव 
सच और सपने का फ़र्क़ । 

सीढ़ी समझकर पैर रख दोगी सपनों के शिखर पर
हरी घास समझकर बैठ जाओगी अवास्तव पर 
और लाल फूल समझकर 
बालों में गूँथ लोगी ढेर सारे सपने।
 
बंद शावर के नीचे खड़ी रह जाओगी 
बारह दिसंबर से समय के अंत तक.... 
यही सोचते हुए के तुम्हारे बाल, शरीर, गर्दन और होठों को 
बोदलेयर* के अद्भुत बादल छू के जा रहे है निरन्तर ....
 



तुम्हारे जिन होठों को चूमा था कोई उद्यमी प्रेमी 
मुझ से प्यार करने के बाद, तुम खो दोगी वह होंठ 
और वहां उग आयेगा एक सुन्दर गुलाब।
 
मुझसे इश्क़ करने के बाद तुम्हारा कुछ भी पहले जैसा नहीं रह जायेगा 
लगेगा जैसे कोई, 
कभी न ठीक होनेवाली बीमारी है तुम्हे सदियों से, 
लेटी हो अस्पताल में। 

दूसरी ही मिनट लगेगा जैसे 
मानव इतिहास में एक तुम ही हो स्वस्थ, 
और बाकी सब बहुत बीमार है।
 
शहर और सभ्यता की गंदी नालियां पार करके चौराहे पे आके 
जब मेरा हाथ पकड़ोगी तुम,
तब तुम्हें लगेगा कि जैसे यह शहर और बीसवीं सदी के 
जीवन और सभ्यता के मैले पानी में 
आसमान छूती हुई एक मृणाल के ऊपर तुम ही हो खिली हुई 

निष्पाप विशुद्ध कमल। 
पवित्र अजर।।

 

( *Baudelaire; the French poet is referred to here)

Saturday, August 11, 2018

বোঝা না বোঝার গল্প

দীপা একটু চাপা স্বভাবের মেয়ে। 
নিমতার দিকে বাড়ি ওর।  
ওকে বলছে অনেকে ক্ষেদের সুরে, তারা বুঝতে পারেনি ওকে!    
ওর স্বভাবই দায়ী তার জন্যে।  

সমর বুঝতে পারেনি, দীপা সারাদিন না খেয়ে এতো কষ্টে ছিল যে,
সেই দুপুরে প্রেমের কথা শুনতে ওর বিশ্রী লেগেছিল'!
সমর বুঝতে পারেনি দীপা সত্যি সত্যিই  বোঝাতে চেয়েছিল' ওর কষ্টটা,
"আমার ভীষণ খিদে পায় জানো!"
মুচকি হেসে, আদুরে গলায় সমর বলেছিল', "হ্যাংলা কোথাকার!"
অনেক বছর পর ওদের আবার যখন দেখা হয়, 
ও বলেছিল', আরও অনেক বেশি বিচলিত হওয়া উচিৎ ছিল দীপার।  
প্রায় কেঁদে ফেলার উপক্রম করলে, সমর হয়তো বুঝতে পারতো, 
ও সত্যিই খেতে পাচ্ছিল' না ওই সময়! 
 দীপা প্রায় কখনই কারোর সামনে কেঁদে ফেলতে পারেনি।  
আর তাই দীপাকে ঠিক বুঝে ওঠা হয়নি কারো।  
সমর বলেছিলো, "বুঝিয়ে দিতে পারতে তো?" 

অশোককে  অনেকেই বলেছে, 
ওর এই উদ্ভট ভাবনাচিন্তা তাদের বোঝার বাইরে!
তাদের গলায় রাগ ছিল।  বা ছিল ওকে নিয়ে দুশ্চিন্তা।  
তারা ওকে প্রায়ই বুঝিয়েছে, "কাজ আর বাড়ি আলাদা!"
"এতো আদর্শ বাড়ি বয়ে আনলে, ঘর সংসার হয় না। " 
"Personal is political" অশোক বলাতে হেসে উঠেছিল বিক্রম।  
"কি বাজে বকছিস! এরকম কিছু হয় না!"
সেদিন মার্চের বিকেলে ওরাও এসেছিলো,
দশ লক্ষ মানুষ যখন উঠে দাঁড়িয়েছিল নারী-হিংসার বিরুদ্ধে।  
"এই সমস্ত কাজকে ব্যক্তিগত সমর্থন জানাতে আসি আমি,"
"হলামই বা ব্যাঙ্ক এর লোক", বিক্রম বলেছিলো।  
একটু ইতস্তত করেছিল অশোক, শেষ পর্যন্ত মনে না করিয়ে দিয়ে পারেনি যে 
গীতার প্রতি বিক্রমেরে ব্যবহারটা ঠিক শান্তি বা সমানতার আওতায় ফেলা যায় না।  
"ওটা ব্যক্তিগত ব্যাপার আমাদের।  সব জায়গায় সব কথা টেনে আনিস না !" 
ময়দানের ব্যক্তিগত আর ঘরের ব্যক্তিগত ব্যাপারগুলোর পার্থক্য অশোক এখনো বুঝে উঠতে পারেনি।  
পারবে বলে মনেও হয় না।  

জাভেদের বহুবার মনে হয়েছে, বুঝে নেওয়ার দায়িত্ব একমাত্র ওর।  
মা বাবা, দাদা বৌদির সারা সপ্তাহের সমস্ত না-বোঝার আক্ষেপরা,
 ওর অপেক্ষায় থাকে।
ওর রবিবারগুলো, সপ্তাহের বাকি দিন গুলোর থেকেও ভারী হয়ে ওঠে কখনো কখনো।     
ও বুঝে বা না বুঝে, সারাদিন বোঝার ভাণ করে, সেইদিন।  
রবিবার ওর বুঝবার দিন।  
সবার বরাদ্দ সময় আছে।  
সবাই বুঝে নেয় নিজের নিজের পাওনা।  
সোমবার এলে ধোয়া জামাকাপড়ের ব্যাগ হাতে আবার রওনা হয় ও।  
ভালোই আছে, খালি বাবা বিয়ের কথা বললে জাভেদ ভয় পায়।  
আরও একজনকে বুঝে চলার বোঝা ও পারবে কি বইতে?
যদি সেই গল্পের উটের মতো ওরও পিঠ ভেঙে পড়ে ?
বন্ধুরা বলেছে ওকে, ওতো না বুঝলেই তো হয়।  
ও মনে মনে জানে, খুব সাধারণ চেহারা ও স্বভাবের জাভেদকে
এই বুঝে চলাটুকুর জন্যেই বাড়ির লোকে সহ্য করে!
নাকি ওরা সত্যিই ভালোবাসে ওকে? 
পরীক্ষা করে দেখার সাহস নেই বাড়ির সেজো ছেলে জাভেদের।  

​"তোকে আমি বড্ডো ভালোবাসি"  গলা ফাটিয়ে বলেছিলো স্মিতা। 
ওর রিনরিনে গলা আকাশ ছুঁচ্ছিল সেদিন।  
স্মিতার বাচ্চাদের মতো সরু পিঠে হালকা চাপড় মেরে বলেছিল তিমির, 
" ভালোবাসা!! বাহ্ বাহ্! দারুন কথা বললি!
"তুইও প্রেম করতে চাস, বল?"
জোরে হেসে উঠেছিলো দুজনেই,
আকাশের দিকে ছোঁড়া ওদের হাতে হাতে তালির শব্দও যেন হেসে উঠেছিল সেই সঙ্গে ।  

সেই বছরের শেষের দিকে,
তিমিরের বিয়ের খবরে থমকে গেছিলো স্মিতা...
 তিমির বলেছিলো,"বোঝার মতো করে বলবি তো! 
অমনি করে ভালোবাসার কথা বলে নাকি কেও?" 
রিনরিনে গলাটা এবার যেন একটু খাদের দিকে নামছিলো। 
"পারবি তুই তিমির? বোঝার পরও পারবি?" 
বুঝলে কি পারতো, প্রশ্নটা তিমিরেরও ছিল সেদিন, 
আর বোঝেনি কি সত্যিই সে? সেই প্রশ্নটাও!   

আহ! কেন যে বুঝে নিতে হয়? 
বুঝে নেবার দরকার কি? না বুঝলে কি হয়? 
কেন বুঝে যেতে হয় কারোর চলে যাওয়া
কেন অবুঝ হলে ফেরত আসে না তারা,
ভাবে শাবানা মনে মনে। 
ভাবে আকাশ যেরকম কাঁদে কারোর কোনো তোয়াক্কা না করে,
আকাশের যেমন বুঝদার হবার দায় নেই, তারও না থাকলে ভালো হতো!
বুঝদার হয়ে, কিই বা ভালো হয়েছে কারোর! 
নিজের ওপরেই রেগে  হাতের চাবি ছোঁড়ে দেয়ালে শাবানা, 
আর মন দিয়ে দেখে দেওয়ালের গায়ের ক্ষত। 
দেয়াল ক্ষত বিক্ষত হয়েও চুপ করে থাকে।   

আর ফিস ফিস করে বলে দীপা  সমরকে, "বুঝতে পারলে কি কিছু বদলে যায়?" 

Monday, July 9, 2018

When you have all the time of the world..

Come back when you have all the time of the world
Almost a whole life,
I have lots to talk to you!
Come back when we can finally sit face to face,
Without the worries of the world.
I have lots to ask.

I want to ask were the lies really necessary?
Or was it that the truth became as meaningless as the lies?
 By then!
No! you do not have to segregate them.
Not, if you do not want to.
You can remain as entwined in both.
But, let me ask anyway!

Come back with the memories of this life.
I want to ask you about the time you finally turned back and walked away.
Did you reach where you wanted to go?
Or did you wander in the wonder-less spectacle of the world that you created?

I want to hear how did the new life finally treat you?
Was it really as novel?
I hope it was.
Hope it was not a newly coated version of the one you had been living thus far!
I have often seen those being offered!
Scratch the surface, and it's same old! same old!
I agree though familiarity has its appeal.

Come back when you have all the time of the world,
I have so much to tell you!

I have to tell you how something termed as filial love,
Turned into romantic love.
No. I will not call it incest.
I don't believe in judging love.
It is one of those truths and untruths till you see what suits you better.
I have seen it.
You will say, you lived it!
So what! Listen to the viewer's perspective too.
You have time now.
And I had the advantage of being in the balcony seat.

Come back when no one is looking for you!
I have to tell you how each road of my known city changed,
So much so that I started avoiding them.
Have I already told that?
Never mind!
Its another life.
That kind of repetition is allowed.

The kind that is not allowed are the ones that resemble rotational motion.
The kind that makes people think its a story akin to waves and the sea shore.
However far one may go, one would definitely return!
Those repetitions create illusion of certainty.
And I have to tell you about uncertainty now.
And how it plays out.
And how words said to one repeated to another, still sound as sweet.

You would say, "I know!!
I have lived it!"
I would say, "So what!
You can listen to the witness too.
You finally have time!"





Wednesday, May 30, 2018

গাছ আর পাখির উল্টো গল্প ~


Image courtesy: Google images
বছর ঘুরলে কত কি বদলায়
গাছের ডানা গজায়
পাখির শিকড়!
অথচ গাছের সময় নেওয়ার কথা ছিল,
অন্তত একশ' বছর,
পাখির আবার সময় কি!
মেরে কেটে বছর দুই
পরিযায়ী পাখিরা কতোই বা বাঁচে!

বছর ঘুরলে সব হিসেব উল্টো হয়ে যায়।
গাছের মাটিতে ছড়িয়ে যাবার কথা ছিল
কিন্তু, শিকড় চলে গেলো পাখির ভিতর!
গাছ মনে রাখতে পারলো না, সে গাছ!
আর পাখির বুকে একশ' বছরের স্বপ্ন ছড়িয়ে দিলো শিকড়!
নিজের আয়ু ভুলে গেলো সে।
মাটি এদিকে গাছকে মুক্ত করে দিলো,
জড়িয়ে ধরলো পাখিকে।
বললো, "থেকে যাও এখানে!
আমার একা লাগছে!"

গাছের আর থাকা হলো না।
পাখির আর ওড়া হলো না!

Who is Fumbling on Forgiveness After All?

It has been a long time since I have been musing on this topic. I wanted to write on it quite a few times but I, even I, fear being misunder...